Monday, 10 March 2014

चुनाव खर्च

सरकार ने चुनाव खर्च की सीमा बढाने का निर्वाचन आयोग का प्रस्ताव मान लिया है। जाहिर है, इस फैसले से चुनाव लडने के इच्छुक लोगों ने राहत की सांस ली होगी। अभी तक चुनाव खर्च की सीमा लोकसभा उम्मीदवार के लिए चालीस लाख और विधानसभा उम्मीदवार के लिए सोलह लाख रुपए थी। इसे बढाने की मांग काफी समय से होती रही है। पखवाडे भर पहले निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में कानून मंत्रालय को पत्र लिखा था। अब लोकसभा उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा सत्तर लाख कर दी गई है। अलबत्ता गोवा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम जैसे छोटे राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों अंडमान निकोबार, चंडीगढ, दादरा एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव, पुदुच्चेरी और लक्षद्वीप में लोकसभा उम्मीदवार के लिए बढी हुई खर्च सीमा चैवन लाख रुपए होगी। इसी तरह असम को छोड कर पूर्वोत्तर और पुदुच्चेरी में विधानसभा उम्मीदवार अब बीस लाख रुपए तक खर्च कर सकेंगे, जबकि बाकी देश में विधानसभा प्रत्याशियों को 28 लाख रुपए तक खर्च कर सकने की इजाजत होगी। खर्च-सीमा बढाने के पीछे कई तर्क थे। एक यह कि मतदाताओं की संख्या बढी है और इसी के साथ मतदान केंद्रों की भी। दूसरे, प्रचार सामग्री सहित तमाम चीजों की लागत बढ गई है। पर सवाल यह है कि क्या इस बढी हुई खर्च-सीमा के बाद चुनाव प्रचार में पारदर्शिता आएगी और उम्मीदवार अपने खर्चों का सही ब्योरा देंगे? इसकी उम्मीद बहुत कम है। पिछले साल भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि 2009 के चुनाव में उन्होंने आठ करोड रुपए खर्च किए थे। इस पर आयोग ने उन्हें नोटिस जारी किया। पर इससे अधिक कोई कार्रवाई नहीं हुई। दरअसल, हर कोई जानता है कि मुंडे अपवाद नहीं थे, अधिकतर प्रत्याशियों का चुनावी खर्च उससे कई गुना होता है जितना वे आयोग को लिखित रूप में बताते हैं। ऐसे भी लोग होंगे जिन्होंने मुंडे से भी अधिक खर्च किया होगा। अगर वे सही हिसाब दें, जो कि निर्धारित सीमा से अधिक होगा, तो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (6) के उल्लंघन के दोषी माने जाएंगे। इसलिए चंद प्रत्याशी ही वास्तविक ब्योरा देते होंगे। पर मुददा उम्मीदवारों का ही नहीं, पार्टियों की तरफ से होने वाले खर्च का भी है। पार्टियों के लिए खर्च की कोई हदबंदी नहीं है। इसका फायदा उठा कर बहुत सारा व्यय पार्टियों के हिस्से में दिखा दिया जाता है। फिर, प्रत्याशियों के लिए व्यय-सीमा का प्रावधान चुनाव घोषित होने के बाद लागू होता है। जबकि व्यवहार में चुनाव प्रचार उसके काफी पहले से शुरू हो जाता है। हालाकि चुनाव घोषणा के पूर्व से ही   रैलियों, पोस्टरों-बैनरों और विज्ञापनों पर अंधाधुंध  खर्च जारी है। ऐसे में उम्मीदवारों के लिए अधिकतम खर्च की मर्यादा बहुत मायने नहीं रखती।
अगर कोई दल या उम्मीदवार सादगी से अपना प्रचार अभियान चलाना चाहता और अपने खर्चों का सही ब्योरा देने को तैयार है तो उसके लिए जरूर नई व्यय-सीमा मददगार साबित होगी। लेकिन ज्यादातर मामलों में नए फैसले से भी कोई फर्क नहीं पडेगा। वास्तविक व्यय और आयोग को दिए जाने वाले हिसाब में भारी फर्क का सिलसिला चलता रहेगा। यों राजनीतिक दल यह दावा करते रहे हैं कि सारा खर्च वे अपने सदस्यों और समर्थकों से मिले चंदों से उठाते हैं। लेकिन असज कुछ ओर ही होता है। हमारी राजनीति के संचालन में काले धन की भूमिका होने की भी बात कही जाती है। दुनिया के अनेक देशों में पार्टियों के लिए अपने सारे चंदे का स्रोत बताना कानूनन अनिवार्य है। भारत में भी ऐसा किया जाना चाहिए। चुनाव सुधार के लिए समय-समय पर बनी समितियों ने बहुत-से मूल्यवान सुझाव दिए हैं। पर उनकी सिफारिशें धूल खा रही हैं। उनके सुझावों पर कब विचार होगा?

Thursday, 6 March 2014

महानायक की महामजबूरियां ......!!

सहारा इंडिया प्रकरण से अपने जनरल नालेज में यह जानकर एक और इजाफा हुआ कि अपने महानायक यानी बिग बी यानी अमिताभ बच्चन जिन लोगों के एहसानों तले दबे हैं, उनमें सहारा इंडिया के सहाराश्री यानी सुब्रत राय सहारा भी शामिल हैं। अभी तक हम यही जानते थे कि महानायक केवल अपने छोटे भैया यानी अमर सिंह के एहसानों तले ही दबे हैं। खुद अमिताभ ने तो कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन अमर सिंह ने हताशा में कई बार कहा कि ,यदि वे नहीं होते तो सदी का यह महानायक मुंबई की सड़कों पर टैक्सियां चला रहा होता.। बकौल अमर सिंह यह स्वीकारोक्ति खुद बच्चन साहब की है। सहारा प्रकरण के जरिए चैनलों पर जो फुटेज चली उसमें साफ दिखाई देता है कि सहाराश्री के किसी समारोह में बच्चन साहब अपने पूरे परिवार के साथ न सिर्फ खुद ठुमके लगा रहे हैं. बल्कि अपने बेटे अभिषेक को भी नाचने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इसी बहाने यह खुलासा हुआ कि बच्चन साहब पर एहसान करने वालों में सहाराश्री भी शामिल है। चैनलों पर बार - बार दिखाए गए फुटेज से भी इस बात की पुष्टि होती है कि सचमुच बिग बी उनके कायल थे। अन्यथा किसी की खुशी में कोई भला इस कदर नाचता है क्या । वैसे नाचने वालों में तो कई और दिग्गज  हस्तियां भी चैनलों पर दिखाई पड़ी । जो बगैर पैसों  के शायद अपना पसीना भी किसी को न देते हों। हालांकि यह खुलासा नहीं हो सका कि उन हस्तियों पर सहाराश्री ने कोई एहसान किया था या नहीं। कई बार खबर देखते समय चैनलों पर अक्सर दाऊद इब्राहिम का जिक्र हो आता है। इस दौरान कई बार चैनलों पर दिखाई दिय़ा कि दाऊद के बाल - बच्चों के शादी - ब्याह या जन्म दिन बगैरह पर बालीवुड के कई हस्तियां ने नाचा - गाया औऱ खुशियां मनाई। कुछ कलाकारों ने स्वीकार भी किया कि वे दाऊद इब्राहिम के कार्यक्रम में गए थे। अपनी सफाई में उन्होंने कहा कि वे कलाकार हैं, और पैसों के लिए कहीं भी चले जाते हैं। लेेकिन सहारा श्री बनाम बिग बी का यह मामला बिल्कुल नया है। क्योंकि सुब्रत राय सहारा के साथ उनकी नजदीकियां की ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई थी। सब यही जानते हैं कि अमिताभ बच्चन की केवल अमर सिंह के साथ ही दांत - काटी रोटी का रिश्ता रहा है। इससे पहले अपने किशोरावस्था के दौरान हम सुनते थे कि अमिताभ बच्चन की नेहरु - गांधी परिवार के साथ  घनिष्ट संबंध हैं। लेकिन राजीव गांधी की मौत के बाद यह रिश्ता टूट गया। बाद में बिग बी मुलायम और अमर सिंह क नजदीक हो गए।  अब तक हम यही समझते थ कि साधारण लोगों के अापसी रिश्तों में ही उतार - चढ़ाव आता है। लेकिन सहाराश्री प्रकरण से यह साबित होता है कि बड़े - बड़े दिग्गजों को भी किसी न किसी के एहसान तले दबना पड़ता है। सदी का  महानायक हो या महा - आम आदमी -  जैसे कद का आदमी उस स्तर की उसकी  मजबूरियां .... । 

Tuesday, 4 March 2014

नीतीशजी ! आप तो एेसे न थे...!!

कोलकाता से करीब 60 किलोमीटर पश्चिम में एक छोटा सा स्टेशन है दुआ। 1997 मे तत्कालीन रेल मंत्री के तौर पर  इस स्टेशन का उद्घाटन बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार ने किया था। कार्यक्रम के कवरेज के सिलसिले में देर तक नीतीश कुमार के साथ  रहने का अवसर मिला। वह जमाना लालू यादव का था।  लेकिन कुछ खासियतों के चलते मुझे नीतीश कुमार तब हिंदी पट्टी के बेहद सुलझे हुए नेता लगे थे। अपने गृह प्रदेश बिहार के लालू यादव के ठेठ देशी अंदाज के विपरीत नीतीश के व्यक्त्तिव  में गजब की सौम्यता थी। स्टेशन का उद्घाटन करने के साथ ही नीतीश ने रेलवे सुरक्षा बल जवानों के एक समारोह को भी संबोधित किया था। साधारणतः एेसे कायर्क्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति दर्ज कराते हुए रेल मंत्री जवानों के लिए इनामी  राशि व  तमाम लोकलुभावन घोषणाएं करते हैं। लेकिन परंपरा के विपरीत नीतीश कुमार ने इससे परहेज करते हुए केवल मुददे की बात कही। इससे मै इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि  हिंदी पट्टी से  और मंडल -कमंडल की राजनीति की उपज होने के बावजूद  नीतीश कुमार काफी सुलझे हुए हैं। 2005 में उनके बिहार का मुख्यमंत्री बनते - बनते रह जाने और फिर हुए उपचुनाव में भारी बहुमत से उनके मुख्यमंत्री बनने से लेकर 2011 में उनके दोबारा सत्तासीन होने तक नीतीश कुमार  के हर कदम व फैसले में परिपक्वता झलकती थी। हिंदी पट्टी के परंपरागत नेताओं के विपरीत अगड़ा - पिछड़ा और अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक राजनीति से परहेज करते हुए नीतीश ने सुशासन बाबू की अपनी अच्छी - खासी पहचान बनी ली थी। जाति व धर्म के मुद्दे को छोड़ केवल सुशासन व विकास के मुद्दे पर लड़े गए चुनाव की वजह से तब मुझे बिहार सचमुच बदलता नजर आया था। क्योंकि पहली बार बिहार में हुए चुनाव में लालू के चर्चित माई समेत तमाम समीकरण ध्वस्त हो गए थे।   लेकिन अचानक नीतिश कुमार के  के फिर पुरानी लीक पर लौटने पर गहरा आश्चर्य हुआ। बेशक राजग या भाजपा से अलग होने का फैसला उनका व्यक्तिगत या दलगत मामला हो सकता है। लेकिन एेसा प्रतीत होता है कि  उनके इस कदम से किसी न किसी रूप में हिंदी पट्टी में मंडल - कमंडल और अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ  रहा है। नीतीश कुमार और उनके समर्थक मानें या न  मानें , लेकिन यह निश्चित है कि राष्ट्रीय जनता दल विधायकों को तोड़ने के कथित प्रयासों के चलते हाशिए पर पड़े लालू प्रसाद यादव को उन्होंने बेवजह ही सहानुभूित का पात्र बना दिया। इसी के साथ  उनकी साफ - सुथरी राजनीति की छवि को भी थोड़ा ही सही पर धक्का लगा है। क्या भारतीय राजनीति में मंडल - कमंडल,  अगड़ा - पिछड़ा या अल्पसंख्यक - बहुसंख्यक राजनीति से इतर राजनेता के उभरने की उम्मीद बेमानी है। इस बीच बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग पर उनकी पार्टी द्वारा बंद का आह्वान करना भी गले नहीं उतरा। चुनाव नजदीक आने पर ही नीतीश ने इस पर आक्रामकता क्यों दिखाई, और फिर विकास की बात करने वालों के मुंह से बंद की बात भी आम लोगों के गले नहीं उतरी। 
तारकेश कुमार ओझा

Friday, 28 February 2014

रामविलास का भाजपा मिलाप!!



लोजपा नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के अपने परंपरागत मित्र लालू प्रसाद यादव या नीतिश कुमार के बजाय भाजपा का दामन थामने पर आश्चर्य भले ही व्यक्त किया जा रहा होए लेकिन इसके आसार बहुत पहले से नजर आने लगे थे। क्योंकि रामविलास पासवान के पास इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था। लालू यादव के साथ गठबंधन का परिणाण वे एक बार भूगत चुके थे। नीतीश कुमार के साथ दोस्ती में भी उनके सामने जोखिम था। लिहाजा अवसरवादी राजनीति के जीवंत मिसाल रामविलास पासवान के लिए  12 साल बाद फिर राजग में लौटना ही सर्वाधिक सुविधाजनक था। वैसे भी रामविलास पासवान हमेशा धारा के साथ बहने में यकीन करते हैं। मंडल राजनीति की उपज पासवान यदि वीपी सिंह की अंगुली पकड़ कर राजनीति की पगडंडी पर चले,

 तो देवगौड़ा से लेकर गुजराल और वामपंथी दल और फिर एकदम यू टर्न लेते हुए वाजपेयी सरकार की शोभा बढ़ाने से भी नहीं हिचकिचाए। एेसे में भारत में घुसे अवैध बंगलादेशियों को भारत की नागरिकता देने की मांग कर चुके पासवान यदि फिर उसी भाजपा के साथ हो गएए जिसे वे पिछले 12 साल तक कोसते रहे, तो इस पर आश्चर्य कैसा। वैसे अवसरवादिता के लिए सिर्फ पासवान को ही क्यों दोष दिया जाए। एक राज्य की मुख्यमंत्री को पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को जेल से रिहा करना जरूरी लगा क्योंकि इससे उसे अपने  प्रदेश में राजनैतिक फायदा मिलना तय है।  देशद्रोह व अन्य जघन्य अपराध में जेलों में बंद रहे पंजाब के भुल्लर और कश्मीर के अफजल गुरु के मामले में पंजाब और कश्मीर में लंबी राजनीतिक पारी खेली जा चुकी है । एक और महिला मुख्यमंत्री ने राजकाज संभालते ही मस्जिदों के इमामों के लिए मासिक भत्ते का एेलान कर दिया। यह जानते हुए भी सरकारी खजाने की हालत खराब हैए और इससे दूसरे वर्गों में भी एेसी मांग उठ सकती है।  बिहार के कथित सुशासन बाबू कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार को अचानक अपने प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का सूझाए और लगे हाथ उन्होंने बंद का ऐलान भी कर दिया। क्योंकि आखिर लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें भी तो अपने तरकश में कुछ तीर सजाने हैं। केंद्र सरकार जल्द ही अपने कर्मचारियों के लिए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने वाली हैए यह जानते हुए भी इससे सरकारी खजाने पर अरबों का बोझ बढ़ेगा , साथ ही देश में महंगाई और आर्थिक असमानता भी भयंकर रूप से बढ़ेगी। लेकिन सरकार मजबूर है क्योंकि सरकार चलाने वालों को जल्द ही चुनावी दंगल में कूदना हैए और एकमुश्त वोट पाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को खुश करने से अच्छा उपाय और कुछ हो नहीं सकता। केंद्र की देखादेखी राज्यों की सरकारें भी अपने कर्मचारियों का समर्थन पाने के लिए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने को मजबूर होंगी। इससे देश में कायम अराजकता का और बढ़ना बिल्कुल तय है। लेकिन सवाल है कि देश के उन करोड़ों लोगों का क्या होगा ए जो रोज कमा कर खाते हैं। महंगाई के अनुपात में जिनकी कमाई रत्तीभर भी नहीं बढ़ पाती। 

मुश्किल में है सरकार...

लगता है कि भारत की सरकार बहुत बूरे दिनो से गुजर रही हैं। आये दिन सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ खुलासा किया जा रहा हैं। जिसके कारण सत्ता की कुर्सी डगमगाने लगी हैं। लोकसभा चुनाव  जैसे जैसे नजदीक आते जा रहे है वैसे वैसे सरकार के लिए मुश्किले बढ़ती जा रही हैं अगर देखा जाए तो यूपीए चारो ओर से घिर चुकी हैं। जितने घोटालेए भ्रष्टाचारए महंगाईए बलात्कार और अन्य गडबडियों के खुलासे यूपीए के शासनकाल में हुए है उतनी किसी और पार्टी के शासनकाल में नहीं हुई होगी। विरोधी पार्टियों के आरोपों से लगता है कि यूपीए सरकार घोटाले की सरकार बनती जा रही हैं। हाल में हुए खुलासे से सरकार हिल चुकी हैं। कोल ब्लॉक आवंटन तथा २ जी स्पेक्ट्रम पर मुश्किल में फंसी यूपीए सरकार को कैग की ताजा रिपोर्ट ने एक और धक्का दिया है।
विपक्ष के लगातार दबाव के बावजूद न तो इन जिम्मेदार मंत्रियों को और न ही तत्कालीन दूरसंचार मंत्री को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया। पर अब खुद ए राजा की ओर से स्थिति साफ की गई है कि नीलामी में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को सारी जानकारियां थीं। विपक्ष को युपीए सरकार को घेरने का मौका मिल गया।
सिर्फ यही नहीं कि द्रमुक और तृणमूल की समर्थन वापसी से जेपीसी में यूपीए का बहुमत नहीं हैए बल्कि भाजपाए वाम दलए द्रमुक और सपा की नाराजगी तथा पीसी चाको को पद से हटाने की उनकी मांग को देखते हुए जेपीसी की रिपोर्ट के संसद में पेश होने पर ही संदेह है।
इसी तरह कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी सीबीआई की जांच रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए जाने से पहले सरकार पर उसमें बदलाव करने के जो आरोप लगे हैंए वे काफी गंभीर हैं और सांविधानिक संस्थाओं के कामकाज में दखल देने के आरोपों से इंकार नहीं किया जा सकता।
यदि सीबीआई इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय को सच बता देती हैए तो सरकार की छवि और खराब होगी। मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगने की भाजपा की मांग पर सोनिया गांधी का सख्त रुख अपनी जगह हैए लेकिन इस पूरे प्रसंग में सबसे ज्यादा किरकिरी प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय की ही हो रही है। ऐसे में अब प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की जिम्मेदारी है कि वे लोगों के इस भ्रम को तोड़े कि वे सिर्फ सोनिया गांधी के कठपूतली के तरह काम करते हैं।  इस शासनकाल में इनके अलावा भी कई घोटाले उजागर हुए लेकिन उनका अभी तक कोई निर्णय नहीं हो पाया हैं। दूसरा मुद्दा जो कि सबके रोंगटे खडे कर देता हैं। आखिर कब तक इस तरह के दूष्कर्मो से बच्चियांए लडकियां और महिलाएं पीड़ित होती रहेगी या मरती रहेगीघ् बीते साल १६ दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि गुडिया रेप केस ने सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी कर दी है। पांच साल की बच्ची से रेप की पृष्टभूमि में हाल फिलहाल शुरू  हुए बजट सत्र के दूसरे चरण में कानून व्यवस्था को लेकर सरकार का घिरना तय है। दिल्ली में इस रेप कांड को लेकर जबरदस्त जनाक्रोश है।दिल्ली पुलिस एक बार फिर से कठघरे में खड़ी है। इस पकरण को लेकर केद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को सदन में जवाब देना मुश्किल होगया। भाजपा तो कांग्रेस पार्टी के सांसद और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित भी सरकार से दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार को हटाने की मांग पर अड़े हैं। मालूम हो कि दिल्ली पुलिस केद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और कानून व्यवस्था के बिगड़ने की जब बात आती है तो जनता को जवाब दिल्ली सरकार को देना पड़ता है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले भी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने की मांग कर चुकी हैं। दिल्ली में पीएम आवास १० जनपथ दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर जबरदस्त प्रदर्शनों के बीच शुरू हो रहे सत्र में विपक्षी हमलों से सरकार का बचना आसान नहीं होगा। सरकार के लिए ये राहे आसान नहीं लगती हैं।

Friday, 21 February 2014

जिसकी बीवी मोटी उसका ही बड़ा नाम हैं

महिला सशक्तीकरण को लेकर महिलाएँ भले ही न चिन्तित होंए लेकिन पुरूषों का ध्यान इस तरफ कुछ ज्यादा होने लगा है। जिसे मैं अच्छी तरह महसूस करता हूँ। मुझे देश.दुनिया की अधिक जानकारी तो नहीं हैए कि ष्वुमेन इम्पावरमेन्टष् को लेकर कौन.कौन से मुल्क और उसके वासिन्दे ष्कम्पेनष् चला रहे हैंए फिर भी मुझे अपने परिवार की हालत देखकर प्रतीत होने लगा है कि अ बवह दिन कत्तई दूर नहीं जब महिलाएँ सशक्त हो जाएँ।
मेरे अपने परिवार की महिलाएँ हर मामले में सशक्त हैं। मसलन बुजुर्ग सदस्यों की अनदेखी करनाए अपना.पराया का ज्ञान रखना इनके नेचर में शामिल है। साथ ही दिन.रात जब भी जागती हैं पौष्टिक आहार लेते हुए सेहत विकास हेतु मुँह में हमेशा सुखे ष्मावाष् डालकर भैंस की तरह जुगाली करती रहती हैं। नतीजतन इन घरेलू महिलाओं ;गृहणियोंध्हाउस लेडीजद्ध की सेहत दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से बनने लगी है फिर भी इनके पतिदेवों को यह शिकायत रहती है कि मेवाए फल एवं विटामिन्स की गोलियों का अपेक्षानुरूप असर नहीं हो रहा है और इनकी पत्नियों के शरीर पर अपेक्षाकृत कम चर्बी चढ़ रही है। यह तो आदर्श पति की निशानी हैए मुझे आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यद्यपि मैंने सुन रखा था कि सिनेमा जगत और समाज की महिलाएँ अपने शरीर के भूगोल का ज्यादा ख्याल रखती हैंए इसीलिए वह जीरो फिगर की बॉडी मेनटेन रखने में विश्वास रखती हैं। यह तो रही फिल्मी और कमाऊ महिलाओं की बात।
मेरे परिवारध्फेमिलीध्कुनबे की बात ही दीगर है। पतियों की सेहत को तो घुन लगा है और उनकी बीबियाँ हैं कि ष्टुनटुनष् सी नजर आती हैं। परिवार के सदस्य जो पतियों का दर्जा हासिल कर चुके हैं। वह बेचारे प्रख्यात फिल्मी गीतकार मरहूम गुलशन बावरा की शक्ल अख्तियार करने लगे हैं। और उनके सापेक्ष महिलाओं का शरीर इतना हेल्दी होने लगा है जिसे ष्मोटापाष् ;ओबेसिटीद्ध कहते हैं। यानि मियाँ.बीबी दोनों के शरीर का भूगोल देखकर पति.पत्नी नहीं माँ.बेटा जैसा लगता है। यह तो रही मेरे परिवार की बात। सच मानिए मैं काफी चिन्तित होने लगा हूँ। वह इसलिए कि 30.35 वर्ष की ये महिलाएँ बेडौल शरीर की हो रही हैंए और इनके पतिदेवों को उनके मोटे थुलथुल शरीर की परवाह ही नहीं।
मैं चिन्तित हूँ इसलिए इस बात को अपने डियर फ्रेन्ड सुलेमान भाई से शेयर करना चाहता हूँ। यही सब सोच रहा था तभी मियाँ सुलेमान आ ही टपके। मुझे देखते ही वह बोल पड़े मियाँ कलमघसीट आज किस सब्जेक्ट पर डीप थिंकिंग कर रहे हो। कहना पड़ा डियर फ्रेन्ड कीप पेशेंस यानि ठण्ड रख बैठो अभी बताऊँगा। मुझे तेरी ही याद आ रही थी और तुम आ गए। सुलेमान कहते हैं कि चलो अच्छा रहा वरना मैं डर रहा था कि कहीं यह न कह बैठो कि शैतान को याद किया और शैतान हाजिर हो गया। अल्लाह का शुक्र है कि तुम्हारी जिह्वा ने इस मुहावरे का प्रयोग नहीं किया। ठीक है मैं तब तक हलक से पानी उतार लूँ और खैनी खा लूँ तुम अपनी प्रॉब्लम का जिक्र करना। मैंने कहा ओण्केण् डियर।
कुछ क्षणोपरान्त मियाँ सुलेमान मेरे सामने की कुर्सी पर विराजते हुए बोले. हाँ तो कलमघसीट अब बताओ आज कौन सी बात मुझसे शेयर करने के मूड में होघ् मैंने कहा डियर सुलेमान वो क्या है कि मेरे घर की महिलाएँ काफी सेहतमन्द होने लगी हैंए जब कि इनकी उम्र कोई ज्यादा नहीं है और ष्हम दो हमारे दोष् सिद्धान्त पर भी चल रही हैं। यही नहीं ये सेहतमन्द.बेडौल वीमेन बच्चों को लेकर आपस में विवाद उत्पन्न करके वाकयुद्ध से शुरू होकर मल्लयुद्ध करने लगती हैं। तब मुझे कोफ्त होती है कि ऐसी फेमिली का वरिष्ठ पुरूष सदस्य मैं क्यों हूँ। न लाज न लिहाज। शर्म हया ताक पर रखकर चश्माधारी की माता जी जैसी तेज आवाज में शुरू हो जाती हैं।
डिन्डू को ही देखो खुद तो सींकिया पहलवान बनते जा रहे हैंए और उनकी बीवी जो अभी दो बच्चों की माँ ही है शरीर के भूगोल का नित्य निश.दिन परिसीमम करके क्षेत्रफल ही बढ़ाने पर तुली है। मैंने कहा सिन्धी मिठाई वाले की लुगाई को देखो आधा दर्जन 5 माह से 15 वर्ष तक के बच्चों की माँ है लेकिन बॉडी फिगर जीरो है। एकदम ष्लपचा मछलीष् तो उन्होंने यानि डिन्डू ने किसी से बात करते हुए मुझे सुनाया कि उन्होंने अपना आदर्श पुराने पड़ोसी वकील अंकल को माना है। अंकल स्लिम हैं और आन्टी मोटी हैं। भले ही चल फिर पाने में तकलीफ होती होए लेकिन हमारे लिए यह दम्पत्ति आदर्श है।
मैं कुछ और बोलता सुलेमान ने जोरदार आवाज में कहा बस करो यार। तुम्हारी यह बात मुझे कत्तई पसन्द नहीं है। आगे कुछ और भी जुबान से निकला तो मेरा भेजा फट जाएगा। मैंने अपनी वाणी पर विराम लगाया तो सुलेमान फिर बोल उठा डियर कलमघसीट बुरा मत मानना। मेरी फेमिली के हालात भी ठीक उसी तरह हैं जैसा कि तुमने अपने बारे में जिक्र किया था। मैं तो आजिज होकर रह गया हूँ। इस उम्र में तुम्हारे जैसे मित्रों के साथ ष्टाइम पासष् कर रहा हूँ। कहने का मतलब यह कि ष्जवन गति तोहरीए उहै गति हमरीष्ष् यानि डियर कलमघसीट अब फिरंगी भाषा में लो सुनो। इतना कहकर सुलेमान भाई ने कहा डियर मिस्टर कलमघसीट डोन्ट थिंक मच मोर बिकाज द कंडीशन ऑफ बोथ आवर फेमिलीज इज सेम। नाव लीव दिस चैप्टर कमऑन एण्ड टेक इट इजी। आँग्ल भाषा प्रयोग उपरान्त वह बोले चलो उठो राम भरोस चाय पिलाने के लिए बेताब है। तुम्हारे यहाँ आते वक्त ही मैंने कहा था कि वह आज सेपरेटा ;सेपरेटेड मिल्कद्ध की नहीं बल्कि दूध की चाय वह भी मलाई मार के पिलाए। मैं और मियाँ सुलेमान राम भरोस चाय वाले की दुकान की तरफ चल पड़ते हैं। लावारिस फिल्म में अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया गाना दूर कहीं सुनाई पड़ता है कि. ष्ष्जिस की बीवी मोटी उसका भी बड़ा नाम हैए बिस्तर पर लिटा दो गद्दे का क्या काम है।
भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

Saturday, 15 February 2014

भैया! पापुलर तो नेपाल वाले प्रचंड भी कम नहीं हुए थे!!




झूठी उम्मीद, कोरा आश्वासन और दोषारोपण। गरीब देश हो अथवा  समाज या आदमी। इनकी जिंदगी नियति के इसी तिराहे पर भटकते हुए खत्म हो जाती है। गरीब कोई नहीं रहना चाहता। लेकिन भारतीय संस्कृति व समाज में गरीबी की महिमा अपरंपार है। एक उम्र गुजारने के बाद हमें मालूम हुआ कि धार्मिक आयोजनों में नर - नारायण सेवा वाले कालम का मतलब फटेहालों के बीच कुछ कंबल - कपड़े बांटना है। बचपन में फिल्मों में अमूमन सभी हीरों को गरीबी का बखान करते देख हमें अपने गरीब होने पर गर्व होता था। खासकर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन गरीबी का महिमांडन कुछ इस प्रकार करते थे, कि हमें लगता था कि भगवान ने  गरीब बना कर हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है। लेकिन खासा समय गुजारने के बाद इल्म हुआ कि  सारे हीरो गरीबी का बखान कर दरअसल अपनी गरीबी दूर करने में लगे हैं। अपने प्यारे  देश की बात बाद में करेंगे। पहले पड़ोस में बसे नेपाल, बंगलादेश व पाकिस्तान आदि की बात कर लें। यहां जब कभी सत्ता बदलती है, बदलाव के सपने देखे - दिखाए जाते हैं। लेकिन अंत में हासिल क्या होता है- वहीं गरीब की किस्मत। एक से निराश हुए तो फिर दूसरे से उम्मीद में टाइम पास। अब अपनी ही बात करूं।  घोर गरीबी और अभाव में बचपन बिता कर ठीक से जवान भी नहीं हो पाए थे कि माता - पिता ने शादी के तौर पर भारी जिम्मेदारी का पैकेज आकर्षक पैक में हमारे हाथों में थमा दिया। असमय बोझ तले दब कर कराहने लगे, तो आश्वासन मिला-  दिल छोटा क्यों करते हो, क्या पता - नवविवाहित पत्नी की किस्मत से ही तुम्हारा कुछ भला हो जाए। फिर एक - एक कर बच्चे होते गए, और हम नाना पाटेकर की तरह अपना सिर पीटने लगे, तो फिर वहीं आश्वासन- अरे मुंह क्यों लटकाए हो- देखना एक दिन यही बच्चे बड़ा होकर तुम्हारे दिन बदल देंगे। अब बच्चों का पालन - पोषण में कमर डेढ़ी हुई जा रही है तो भी, आश्वासनों की घुट्टी - बस कुछ दिन और सब्र करो, बच्चे आत्मनिर्भर हुए नहीं कि तुम्हारी किस्मत बदल जाएगी। अपने देश की किस्मत भी मैं कुछ ऐसा ही पाता हूं। बचपन में इंदिरा गांधी का बड़ा  नाम सुना था। किशोरावस्था में ही उनकी हत्या हो गई, और देश की कमान संभाली, उनके सुपुत्र राजीव ने। कहा गया मिस्टर क्लीन है। देश का भला हुआ समझो। लेकिन जल्द ही निराशा के बादल मंडराने लगे। फिर उम्मीद टिकी राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह पर। लेकिन जल्द ही उनसे भी लोगों का मोह भंग हो गया। चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, लेकिन महज चार महीनों के लिए। सो  वे क्या कर सकते थे। नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान  मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने पर भी यही उम्मीद बंधाई गई थी कि गैर गांधी परिवार के ये तपे - तपाए नेता हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले ही दुनिया हिला चुके हैं। अब देर नहीं, देखते ही देखते देश की किस्मत बदल जाएगी। लेकिन हुआ क्या। अब देश की नई उम्मीद बन कर उभरे हैं सादी  टोपीवाले अरविंद केजरीवाल। कहा जा रहा है गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि का ईमानदार नेता हैं। आज दिल्ली में सफलता के झंडे गाड़े हैं। जल्द ही पूरे देश पर राज करेगा। पापुलरिटी में सब को पीछे छोड़ चुका है। जनता की किस्मत बदलने में अब कैसी देरी। लेकिन अपना मन कहता है कि भैया , पांच साल पहले ऐसे ही पापुलर तो नेपाल वाले प्रचंड भी हुए थे। राजशाही को उखाड़ फेंकने के चलते पुरी दुनिया उनकी प्रचंड लोकप्रियता की  मुरीद हो गई थी। लेकिन औंधे मुंह गिरने में भी उन्हें कितना समय लगा। इसलिए भैया , गरीब आदमी हो या देश। उनकी किस्मत तो भगवान ही बदल सकता है। आज केजरीवाल प्रचंड की जगह है क्या पता कल...