Friday, 28 February 2014

मुश्किल में है सरकार...

लगता है कि भारत की सरकार बहुत बूरे दिनो से गुजर रही हैं। आये दिन सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ खुलासा किया जा रहा हैं। जिसके कारण सत्ता की कुर्सी डगमगाने लगी हैं। लोकसभा चुनाव  जैसे जैसे नजदीक आते जा रहे है वैसे वैसे सरकार के लिए मुश्किले बढ़ती जा रही हैं अगर देखा जाए तो यूपीए चारो ओर से घिर चुकी हैं। जितने घोटालेए भ्रष्टाचारए महंगाईए बलात्कार और अन्य गडबडियों के खुलासे यूपीए के शासनकाल में हुए है उतनी किसी और पार्टी के शासनकाल में नहीं हुई होगी। विरोधी पार्टियों के आरोपों से लगता है कि यूपीए सरकार घोटाले की सरकार बनती जा रही हैं। हाल में हुए खुलासे से सरकार हिल चुकी हैं। कोल ब्लॉक आवंटन तथा २ जी स्पेक्ट्रम पर मुश्किल में फंसी यूपीए सरकार को कैग की ताजा रिपोर्ट ने एक और धक्का दिया है।
विपक्ष के लगातार दबाव के बावजूद न तो इन जिम्मेदार मंत्रियों को और न ही तत्कालीन दूरसंचार मंत्री को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया। पर अब खुद ए राजा की ओर से स्थिति साफ की गई है कि नीलामी में प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को सारी जानकारियां थीं। विपक्ष को युपीए सरकार को घेरने का मौका मिल गया।
सिर्फ यही नहीं कि द्रमुक और तृणमूल की समर्थन वापसी से जेपीसी में यूपीए का बहुमत नहीं हैए बल्कि भाजपाए वाम दलए द्रमुक और सपा की नाराजगी तथा पीसी चाको को पद से हटाने की उनकी मांग को देखते हुए जेपीसी की रिपोर्ट के संसद में पेश होने पर ही संदेह है।
इसी तरह कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़ी सीबीआई की जांच रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए जाने से पहले सरकार पर उसमें बदलाव करने के जो आरोप लगे हैंए वे काफी गंभीर हैं और सांविधानिक संस्थाओं के कामकाज में दखल देने के आरोपों से इंकार नहीं किया जा सकता।
यदि सीबीआई इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय को सच बता देती हैए तो सरकार की छवि और खराब होगी। मनमोहन सिंह से इस्तीफा मांगने की भाजपा की मांग पर सोनिया गांधी का सख्त रुख अपनी जगह हैए लेकिन इस पूरे प्रसंग में सबसे ज्यादा किरकिरी प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय की ही हो रही है। ऐसे में अब प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह की जिम्मेदारी है कि वे लोगों के इस भ्रम को तोड़े कि वे सिर्फ सोनिया गांधी के कठपूतली के तरह काम करते हैं।  इस शासनकाल में इनके अलावा भी कई घोटाले उजागर हुए लेकिन उनका अभी तक कोई निर्णय नहीं हो पाया हैं। दूसरा मुद्दा जो कि सबके रोंगटे खडे कर देता हैं। आखिर कब तक इस तरह के दूष्कर्मो से बच्चियांए लडकियां और महिलाएं पीड़ित होती रहेगी या मरती रहेगीघ् बीते साल १६ दिसंबर को दिल्ली गैंगरेप की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि गुडिया रेप केस ने सरकार के लिए नई मुश्किल खड़ी कर दी है। पांच साल की बच्ची से रेप की पृष्टभूमि में हाल फिलहाल शुरू  हुए बजट सत्र के दूसरे चरण में कानून व्यवस्था को लेकर सरकार का घिरना तय है। दिल्ली में इस रेप कांड को लेकर जबरदस्त जनाक्रोश है।दिल्ली पुलिस एक बार फिर से कठघरे में खड़ी है। इस पकरण को लेकर केद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे को सदन में जवाब देना मुश्किल होगया। भाजपा तो कांग्रेस पार्टी के सांसद और दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित भी सरकार से दिल्ली पुलिस के कमिश्नर नीरज कुमार को हटाने की मांग पर अड़े हैं। मालूम हो कि दिल्ली पुलिस केद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है और कानून व्यवस्था के बिगड़ने की जब बात आती है तो जनता को जवाब दिल्ली सरकार को देना पड़ता है। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पहले भी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन करने की मांग कर चुकी हैं। दिल्ली में पीएम आवास १० जनपथ दिल्ली पुलिस मुख्यालय पर जबरदस्त प्रदर्शनों के बीच शुरू हो रहे सत्र में विपक्षी हमलों से सरकार का बचना आसान नहीं होगा। सरकार के लिए ये राहे आसान नहीं लगती हैं।

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