सरकार ने चुनाव खर्च की सीमा बढाने का निर्वाचन आयोग का प्रस्ताव मान लिया है। जाहिर है, इस फैसले से चुनाव लडने के इच्छुक लोगों ने राहत की सांस ली होगी। अभी तक चुनाव खर्च की सीमा लोकसभा उम्मीदवार के लिए चालीस लाख और विधानसभा उम्मीदवार के लिए सोलह लाख रुपए थी। इसे बढाने की मांग काफी समय से होती रही है। पखवाडे भर पहले निर्वाचन आयोग ने इस संबंध में कानून मंत्रालय को पत्र लिखा था। अब लोकसभा उम्मीदवार के लिए खर्च की सीमा सत्तर लाख कर दी गई है। अलबत्ता गोवा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम जैसे छोटे राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों अंडमान निकोबार, चंडीगढ, दादरा एवं नगर हवेली, दमन एवं दीव, पुदुच्चेरी और लक्षद्वीप में लोकसभा उम्मीदवार के लिए बढी हुई खर्च सीमा चैवन लाख रुपए होगी। इसी तरह असम को छोड कर पूर्वोत्तर और पुदुच्चेरी में विधानसभा उम्मीदवार अब बीस लाख रुपए तक खर्च कर सकेंगे, जबकि बाकी देश में विधानसभा प्रत्याशियों को 28 लाख रुपए तक खर्च कर सकने की इजाजत होगी। खर्च-सीमा बढाने के पीछे कई तर्क थे। एक यह कि मतदाताओं की संख्या बढी है और इसी के साथ मतदान केंद्रों की भी। दूसरे, प्रचार सामग्री सहित तमाम चीजों की लागत बढ गई है। पर सवाल यह है कि क्या इस बढी हुई खर्च-सीमा के बाद चुनाव प्रचार में पारदर्शिता आएगी और उम्मीदवार अपने खर्चों का सही ब्योरा देंगे? इसकी उम्मीद बहुत कम है। पिछले साल भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि 2009 के चुनाव में उन्होंने आठ करोड रुपए खर्च किए थे। इस पर आयोग ने उन्हें नोटिस जारी किया। पर इससे अधिक कोई कार्रवाई नहीं हुई। दरअसल, हर कोई जानता है कि मुंडे अपवाद नहीं थे, अधिकतर प्रत्याशियों का चुनावी खर्च उससे कई गुना होता है जितना वे आयोग को लिखित रूप में बताते हैं। ऐसे भी लोग होंगे जिन्होंने मुंडे से भी अधिक खर्च किया होगा। अगर वे सही हिसाब दें, जो कि निर्धारित सीमा से अधिक होगा, तो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (6) के उल्लंघन के दोषी माने जाएंगे। इसलिए चंद प्रत्याशी ही वास्तविक ब्योरा देते होंगे। पर मुददा उम्मीदवारों का ही नहीं, पार्टियों की तरफ से होने वाले खर्च का भी है। पार्टियों के लिए खर्च की कोई हदबंदी नहीं है। इसका फायदा उठा कर बहुत सारा व्यय पार्टियों के हिस्से में दिखा दिया जाता है। फिर, प्रत्याशियों के लिए व्यय-सीमा का प्रावधान चुनाव घोषित होने के बाद लागू होता है। जबकि व्यवहार में चुनाव प्रचार उसके काफी पहले से शुरू हो जाता है। हालाकि चुनाव घोषणा के पूर्व से ही रैलियों, पोस्टरों-बैनरों और विज्ञापनों पर अंधाधुंध खर्च जारी है। ऐसे में उम्मीदवारों के लिए अधिकतम खर्च की मर्यादा बहुत मायने नहीं रखती।
अगर कोई दल या उम्मीदवार सादगी से अपना प्रचार अभियान चलाना चाहता और अपने खर्चों का सही ब्योरा देने को तैयार है तो उसके लिए जरूर नई व्यय-सीमा मददगार साबित होगी। लेकिन ज्यादातर मामलों में नए फैसले से भी कोई फर्क नहीं पडेगा। वास्तविक व्यय और आयोग को दिए जाने वाले हिसाब में भारी फर्क का सिलसिला चलता रहेगा। यों राजनीतिक दल यह दावा करते रहे हैं कि सारा खर्च वे अपने सदस्यों और समर्थकों से मिले चंदों से उठाते हैं। लेकिन असज कुछ ओर ही होता है। हमारी राजनीति के संचालन में काले धन की भूमिका होने की भी बात कही जाती है। दुनिया के अनेक देशों में पार्टियों के लिए अपने सारे चंदे का स्रोत बताना कानूनन अनिवार्य है। भारत में भी ऐसा किया जाना चाहिए। चुनाव सुधार के लिए समय-समय पर बनी समितियों ने बहुत-से मूल्यवान सुझाव दिए हैं। पर उनकी सिफारिशें धूल खा रही हैं। उनके सुझावों पर कब विचार होगा?
.jpg)
No comments:
Post a Comment