Monday, 27 January 2014

शिवराज का तीसरा कार्यकाल

8 दिसंबर की सर्द सुबह अपने साथ एक नई उम्मीद और नया उजास लेकर आई। इस उजास में राष्ट्र जागरण का
संदेश तो था ही साथ में लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक प्रभावी चेतना दिखाई दे रही थी।  जिस तरह से  चार
राज्यों के नतीजों में भाजपा ने अपना प्रदर्शन किया उससे लोकतंत्र के प्रति विश्वभर में एक नया संदेश पहुंचा।
मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां फिर भाजपा फिर शिवराज का फार्मूला भाजपा के लिए काफी कारगर साबित हुआ।
प्रदेश में जबरदस्त बढ़त के साथ भाजपा ने डेढ़ सौ से ज्यादा सीटों पर अपना स्थान सुनिश्चित किया। इस जीत के
साथ सत्ता में शिवराज की हैट्रिक लगी। इस हैट्रिक में स्वर्णिम मध्यप्रदेश का उत्साह नजर आया। मप्र के मतदाताओं ने शिवराजसिंह चैहान पर पूरा भरोसा किया है और उन्हें सत्ता सौंपी है इसलिए इस युवा मुख्यमंत्री के सामने अब चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। भाजपा की सत्ता में वापसी के साथ प्रदेशवासियों की उम्मीदें शिवराज से और बढ़ जाऐंगी। विकास के मुद्दे पर सत्ता में फिर लौटे शिवराज से अब अधूरे कामों को पूरे करने को लेकर मांग की जाएगी। इन सभी अपेक्षाओं पर खरा उतरना शिवराज और उनके साथियों के लिए काफी मुश्किलभरा रहने वाला है। हालांकि विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के सफल प्रदर्शन का असर लोकसभा चुनावों पर भी पडेगा। वैसे भी पार्टी पहले ही नमो नमो का नारा देकर अपनी मंशा जाहिर कर चुकी है। यदि पार्टी नमो नमो
के इस नारे को भी फिर भाजपा फिर शिवराज की तर्ज पर भुनाने में सफल रही तो उसका सबसे ज्यादा फायदा
राजस्थान, छत्तीसगढ़ सहित मप्र को भी पहुंचेगा और तब मुख्यमंत्री शिवराज की असली परख की जाएगी। प्रदेश की जनता ने पिछले समय हुए विकास कार्यों को देखते हुए जिस भाजपानीत सरकार को चुना उस पर विकास की गति को तेज करने का दोहरा दबाव रहने वाला है। प्रदेश विकास के लिए योजनाऐं तो काफी बन चुकी हैं। मगर जरूरत अब इन्हें धरातल पर लाए जाने की महसूस की जा रही है। शिवराज से अब घोषणावीर की छवि से निकलकर
कर्मवीर बनने की मांग जनता द्वारा की जाएगी। यह मांग ही शिवराज के राजनीतिक जीवन को तय करने वाली दिखाई दे रही है।
पिछली पारियों में भाजपा ने प्रदेश विकास का जो फार्मूला दिया है वह इंदौर, भोपाल तक ही सिमटकर रह गया है। प्रदेश सरकार पर समूचे प्रदेश के विकास की जिम्मेदारी का दबाव रहने वाला है। प्रदेश में हैट्रीक के साथ जनता की अपेक्षाऐं भी बढ़ती नजर आ रही हैं। प्रदेश के मुखिया शिवराज से हर हाथ काम और हर शहर सुविधा मांग रहा है। जो काफी चुनौतियों भरा रह सकता है। जिस तरह से ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट में मेमोरेंडम आफ अंडरस्टेंडिंग पर हस्ताक्षर किए गए उन्हें वास्तविकता के धरातल पर उतारा जाना भाजपानीत सरकार के लिए बेहद जरूरी हो जाएगा। जब बात उज्जैन की हो तो यह काफी अहम हो जाता है। राजनीतिक परिदृश्य में उज्जैन भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है। पिछले चुनावों में भाजपा को मिली जीत और इस चुनाव में लोगों द्वारा शिवराज और विकास को दिया गया जबरदस्त समर्थन एक बार फिर भाजपा सरकार में जोश और दम भरने के लिए पर्याप्त है। शहर के लिए भाजपा की यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आगामी समय में 2016 के दौरान सिंहस्थ आयोजन होना है। शहर के नगर निगम बोर्ड में भी इस बार भाजपा का वर्चस्व बना रहा वहीं प्रदेश में हैट्रिक बनाने के बाद अब सरकार से तालमेल की आस लगाई जा रही है। यदि शहर विकास के मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों में आपसी सामंजस्य बना रहता है तो जनता को बहुत लाभ मिल सकता है। यही उम्मीद शिवराज सरकार से लगाई जा रही है। इसके अलावा उज्जैन उत्तर के विधायक पारस जैन प्रदेश के मंत्रीमंडल में कई बार शामिल रहे हैं। जिस कारण उज्जैन की ओर विकास की अपेक्षा बढ़ जाती है। दक्षिण से जनता ने डाॅ. मोहन यादव पर विश्वास जताया है। जिस कारण सभी को दक्षिण में भी विकास की बयार चलने की आस लगी है। खुद मुख्यमंत्री शिवराज का भी उज्जैन से लगाव किसी से छुपा नहीं है। जिस कारण शहर के लिए विकास का पिटारा खुल सकता है। मगर इन सभी के बावजूद चुनौतियां  मुंहबाऐं खड़ी हैं। यदि भाजपा की यह सरकार इन चुनौतियों पर खरी उतरी तो शिवराज और अन्य सहयोगियों का कद और बड़ा हो सकता है। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो सभी जानते हैं जनता ने दिग्गी राजा को अभी तक नहीं बख्शा है।

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